Clinical Study Designs in Hindi

इस लेख में हम बात करेंगे न्यूट्रिशन विज्ञान में प्रयोग किए जाने वाले Scientific Methods और उनके Clinical Study Designs के बारे में। न्यूट्रिशन के वैज्ञानिक न्यूट्रिशन के बारे में जो भी जानते हैं वह उनको कैसे पता चलता है? उन्हें कैसे पता चलता है कि कैल्शियम क्या काम करता है? उन्हें कैसे पता चलता है कि कोलेस्ट्रॉल की मात्रा अधिक होने से दिल की बीमारियाँ हो सकती हैं? उन्हें कैसे पता चलता है कि कौन से न्यूट्रिएंट्स का हमारे शरीर से क्या संबंध है? यह सब जानने के लिए न्यूट्रीशन के वैज्ञानिक जो तरीके प्रयोग करते हैं, वह सभी तरीके हम इस आर्टिकल में समझेंगे।

Scientific Method (वैज्ञानिक विधि)

सबसे पहले बात करते हैं कि Scientific Method क्या होता है। हमारे आसपास जो कुछ भी हो रहा है, उसको समझने के लिए एक Systematic तरीका प्रयोग किया जाता है, उसको हम Scientific Method कहते हैं। किसी भी प्रश्न का उत्तर जानने के लिए पहले एक अनुमान लगाया जाता है। उस अनुमान के आधार पर प्रयोग किए जाते हैं। बार-बार प्रयोग करने के बाद हमें यह पता चलता है कि हमारा लगाया गया अनुमान सही है या गलत है। यह पूरी प्रक्रिया ही Scientific Method कही जाती है।

1. Observation & Question (पर्यवेक्षण एवं प्रश्न)

Scientific Method को हम एक उदाहरण की सहायता से समझने की कोशिश करते हैं। Scientific Method का पहला चरण है Observation & Question। इसका अर्थ है, किसी भी चीज को देखना, उस पर विचार करना और प्रश्न पूछना। जैसे मान लीजिए आपके घर के पास एक तालाब है जो सदियों में ठंड की वजह से जम जाता है। आप उसको देखते हैं और आपके मन में विचार आता है कि ठंड की वजह से तालाब का पानी जम जाता है, लेकिन समुद्र का पानी क्यों नहीं जमता। तो इस तरह से आपने Observe किया और एक प्रश्न पूछा। प्रश्न यह पूछा कि तालाब का पानी क्यों जम जाता है और समुद्र का पानी क्यों नहीं जमता।

2. Hypothesis (परिकल्पना)

दूसरा चरण है Hypothesis। Hypothesis का मतलब है, एक सही अनुमान लगाना। मतलब आपने जो प्रश्न पूछा है उसका उत्तर क्या हो सकता है। काफी देर सोचने के बाद आप यह अनुमान लगाते हो कि तालाब के पानी में नमक नहीं है और समुद्र के पानी में नमक होता है। तो शायद इस वजह से समुद्र का पानी नहीं जमता और तालाब का पानी जम जाता है। तो अब आपने एक Hypothesis सोचा है कि जिस पानी में नमक होगा वह पानी ठंड में नहीं जमेगा।

3. Experiment (प्रयोग)

तीसरा चरण है Experiment का। Experiment का मतलब है प्रयोग करके देखना। अभी जो Hypothesis आपने सोचा है, आप उसकी जांच करने के लिए एक प्रयोग करना चाहते हो । प्रयोग से आप देखना चाहते हो कि आपका अनुमान सही है या गलत है। प्रयोग करने के लिए आप बिल्कुल साफ पानी से भरे दो कप ले लेते हो। एक कप में पानी को साफ ही रहने देते हो और दूसरे कप के पानी में कुछ नमक मिला देते हो। साफ कप का पानी तालाब के पानी के जैसा है जिसमें नमक नहीं है और दूसरे कप का पानी समुद्र के पानी के जैसा है जिसमें नमक है। अब आप दोनों कप को 4 घंटे के लिए फ्रिज में रख देते हो। तो यह Hypothesis की जांच करने के लिए आपने एक प्रयोग किया है।

4. Result & Interpretation (परिणाम एवं व्याख्या)

चौथा चरण है Result & Interpretation। इसका मतलब है परिणाम को देखना और उसको समझना। अभी आप क्या करते हो, जो दोनों कप आपने फ्रिज में रखे थे, उनको निकाल कर देखते हो कि क्या हुआ है। अगर साफ पानी वाला कप जम गया है और नमक के पानी वाला कप वैसा ही है, तो इसका मतलब है कि आपका अनुमान सही था। लेकिन अगर दोनों कप का पानी जम गया है, तो इसका मतलब है आपका अनुमान सही नहीं था। तो इस तरह से आप परिणाम को देखते हो और समझने की कोशिश करते हो।

5. Theory or Conclusion (सिद्धांत या निष्कर्ष)

पांचवा चरण है Theory या Conclusion। इसका मतलब है निष्कर्ष निकालना। आपने जो प्रयोग किया और उसका जो परिणाम है, उसको समझ कर आप एक निष्कर्ष निकालते हो। जैसा कि हमारे प्रयोग में निष्कर्ष यह रहेगा कि दोनों ही कप का पानी जम जाएगा। जिससे यह पता चलेगा कि पानी में नमक की मात्रा से पानी के जमने पर कोई प्रभाव नहीं है। इस तरह से हमने निष्कर्ष निकाल लिया, लेकिन अभी तक हमें हमारे प्रश्न का उत्तर नहीं मिला। तो अभी हम क्या करेंगे? हम अब फिर से विचार करेंगे और नया Hypothesis तैयार करेंगे। फिर उस  Hypothesis की जांच करने के लिए फिर से प्रयोग करेंगे। हम तब तक ऐसा करते रहेंगे जब तक हमें हमारे प्रश्न का उत्तर नहीं मिल जाता।

यह बहुत ही  सरल उदाहरण था। लेकिन इससे आपको समझ आ गया होगा कि Scientific Method क्या होता है और यह कैसे काम करता है।

Clinical Study Design

न्यूट्रिशन विज्ञान में भी किसी भी प्रश्न का उत्तर जानने के लिए यही Scientific Method प्रयोग किया जाता है। जैसे एक प्रश्न है कि किस न्यूट्रिएंट्स की कमी की वजह से हमारे शरीर में खून की कमी हो जाती है। इसके लिए हम एक Hypothesis तैयार करते हैं कि आयरन की कमी की वजह से शरीर में खून की कमी हो जाती है। अब इस Hypothesis की जांच करने के लिए प्रयोग किए जाते हैं, जिससे पता चलता है कि हमारा Hypothesis या अनुमान सही है या नहीं।

Hypothesis तैयार करने के लिए और उस पर प्रयोग करने के लिए जो तरीका प्रयोग किया जाता है, उसे Clinical Study कहते हैं। Clinical Study के अलग अलग प्रकार होते हैं जिन्हे Clinical Study Designs कहा जाता है। Clinical Study Designs की सहायता से जानकारी एकत्रित की जाती है और उस जानकारी का विश्लेषण करके Hypothesis भी तैयार किए जाते हैं और Hypothesis की जांच करने के लिए प्रयोग भी किए जाते हैं।

Clinical Study Designs

Clinical Study Designs बहुत सी प्रकार के हो सकते हैं। इस आर्टिकल में हम कुछ जरुरी Clinical Study Designs को समझेंगे।

Cross-Sectional Study Design

पहला है Cross-Sectioal Study। इस Study में एक ही समय पर, एक पूरी की पूरी जनता का सर्वे किया जाता है और Exposure और Disease के बीच का सम्बन्ध देखा जाता है। इसको Camera Snapshot Study Design  भी कहते हैं क्योंकि यह एक ही समय के अंदर किया जाता है।

Cross Sectional Study Design Example

उदाहरण के लिए, जैसे हम स्मोकिंग और कैंसर के बीच का संबंध देखना चाहते हैं कि स्मोकिंग और कैंसर के बीच क्या संबंध है। इसमें स्मोकिंग को Exposure कहा जाएगा और जो कैंसर है उसको Disease कहा जाएगा। हम 500 लोगों का डाटा ले लेते हैं। पहले हम उन 500 लोगों को दो भागों में बांट देते हैं। Exposed और Not-Exposed ग्रुप में। Exposed ग्रुप में वह लोग हैं जो स्मोकिंग करते हैं और Not-Exposed ग्रुप में वह लोग हैं जो स्मोकिंग नहीं करते। अब जो Exposed ग्रुप है, उसको हम दो भागों में बांट देते हैं। Disease और No-Disease ग्रुप में। Disease में वह लोग हैं जिनको कैंसर है और No-Disease में वह लोग हैं जिनको कैंसर नहीं है। ऐसा ही हम Not-Exposed  ग्रुप में भी करते हैं। उनको भी दो भागों में बांट देते हैं, जिन्हे कैंसर है और जिन्हे कैंसर नहीं है।

अब इस पूरे डाटा का विश्लेषण करके हम जान सकते हैं कि क्या स्मोकिंग और कैंसर के बीच में कोई संबंध है या नहीं है। आप चित्र में देख सकते हैं कि जो लोग स्मोकिंग करते हैं उनमें कैंसर के केस ज्यादा है और जो स्मोकिंग नहीं करते उनमें कैंसर के केस कम है। इस तरह से हमें समझ आता है कि कैंसर और स्मोकिंग का एक संबंध है। यह एक बहुत ही सरल उदाहरण था। यह Study Design, Hypothesis तैयार करने में बहुत सहायता करता है और यह बहुत ही जल्दी किया जा सकता है। इस Study Design में अधिक खर्चा भी नहीं आता। लेकिन इस Study Design में एक समस्या यह है कि इससे बहुत ही कम जानकारी उपलब्ध होती है।

Case-Control Study Design

अब दूसरा Study Design है Case Control Study। इसके नाम से ही आप समझ सकते हैं। Case का मतलब है ऐसा व्यक्ति जिसको कोई बीमारी है और Control का मतलब है ऐसा व्यक्ति जिसको कोई बीमारी नहीं है। जैसे इसका नाम है Case-Control, तो ठीक इसी तरह से एक Case वाले व्यक्ति की तुलना एक Control वाले व्यक्ति से की जाती है। मतलब एक बीमार व्यक्ति की एक स्वस्थ व्यक्ति के साथ तुलना की जाती है। इसमें Matching भी की जाती है। Matching का अर्थ है दोनों व्यक्ति एक जैसे होने चाहिए। उनकी आयु, लिंग और अन्य बातें लगभग समान होनी चाहिए।

Case Control Study Design Example

जैसे यदि हम देखना चाहते हैं कि 50 से 60 वर्ष की महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर के रोग और कॉन्ट्रासेप्टिव के प्रयोग के बीच क्या संबंध है। इसके लिए हम 50 ऐसी महिलाओं को लेंगे जिनको ब्रेस्ट कैंसर है और 50 ऐसी महिलाओं को लेंगे जिनको ब्रेस्ट कैंसर नहीं है। यह हो गया Case-Control, मतलब जितने Case हैं उतने Control भी हैं। सभी महिलाओं की आयु लगभग एक जैसी होनी चाहिए। सभी महिलाओं का सामाजिक और आर्थिक स्तर लगभग एक जैसा होना चाहिए। ऐसा करने को हम मैचिंग कहते हैं। अब जो दोनों ग्रुप्स हैं, उनसे डाटा एकत्रित किया जाता है कि किस किस महिला ने कॉन्ट्रासेप्टिव का प्रयोग किया है, कब प्रयोग किया है, कितने टाइम तक और कितनी मात्रा में प्रयोग किया है। इस प्रकार से जानकारी एकत्रित करके यह खोजने का प्रयास किया जाता है कि जो बीमारी है उसका कारण क्या है। ऐसा करके हम Effect से Cause की तरफ जाने का प्रयास करते हैं। इस तरह की स्टडी को Case-Control Study कहा जाता है।

Cohort Study Design

एक और Study है जिसका नाम है Cohort Study। Cohort शब्द का अर्थ है, एक ऐसा ग्रुप जो एक जैसी विशेषताएं सांझा करता हो। जैसे किसी एक ही कक्षा के विद्यार्थी हैं, किसी एक ही फ़ैक्टरी में काम करने वाले मज़दूर हैं या किसी एक ही गांव के लोग हैं। नाम से ही पता चलता है यह Study ऐसे लोगों पर की जाती है जो एक जैसे Characterstics साझा करते हैं। ग्रुप में जो भी लोग हैं सभी को Observe किया जाता है, उनका डाटा एकत्रित किया जाता है और उस डाटा का विश्लेषण किया जाता है। यह सब एक नियत समय अवधि और अंतराल पर लंबे समय तक किया जाता है।

Cohort Study Design Example

जैसे मान लीजिए एक छोटा सा गांव है जहां पर 5000 लोग रहते हैं। सभी लोगों  की जानकारी कई वर्षों तक एकत्रित करके और उस जानकारी का विश्लेषण करके यह पता लगाया जाता है कि हाई कोलेस्ट्रॉल से दिल की बीमारियाँ होने का खतरा बढ़ जाता है। तो इस तरह की Study को Cohort Study कहते हैं।

अभी तक हमने 3 Studies के बारे में बात की है। Cross-Sectional Study, Case-Control Study और Cohort Study। इन Studies को Epidemiological Studies भी कहा जाता है।

अब हम बात करेंगे Experimental Study के बारे में। यह Study, Cause और Effect या कारण और परिणाम  के संबंध की जांच करने में काम आती है।

Laboratory Based Animal Study

जैसे पहले Study है Laboratory Based Animal Study। यह Study, Laboratory में की जाती है। इस Study में जानवरों को कोई न्यूट्रिएंट्स, कोई मेडिसीन या कोई सप्लीमेंट दिया जाता है, और उस न्यूट्रिएंट्स का क्या असर होता है उसकी जांच की जाती है।

जैसे हम यह देखना चाहते हैं कि Arginine Supplement का Hormones पर क्या असर है तो हम लैब में चूहों को अलग-अलग मात्रा में Arginne सप्लीमेंट देंगे। उनको लंबे समय तक देखने के बाद हमें यह पता चलेगा कि Arginine का Hormones पर क्या असर है? Arginine की कितनी मात्रा असरदार है और इसके दुष्प्रभाव क्या है? यह सब जानकारी हमें मिल जाएगी।

In-Vitro Study

एक Study है जिसको हम कहते हैं In-Vitro Study। यह Study भी Lab में की जाती है। यह Study जानवरों पर या मनुष्यों पर नहीं की जाती। इस Study में जानवरों से, मनुष्यों से या किसी भी जीवित प्राणी से कोई Tissue, कोई Cell या कोई Molecule ले लिया जाता है और उस पर अलग-अलग तरह के प्रयोग किए जाते हैं।

Human Based Clinical Trial

एक Study है जिसको हम कहते हैं Human Based Clinical Trial। यह Study मनुष्यों पर की जाती है। इस Study में कुछ लोगों का चुनाव किया जाता है। उन सभी लोगों को कोई सप्लीमेंट या मेडिसीन दी जाती है और उसका प्रभाव देखा जाता है।

Clinical Trial Example

जैसे हम यह देखना चाहते हैं कि CLA का फैट लॉस पर क्या प्रभाव है। इसके लिए हम 20 स्वस्थ व्यक्तियों का चुनाव करते हैं जो लगभग एक जैसे होते हैं। उनकी शारीरिक गतिविधियाँ, आयु, लिंग, सामाजिक और आर्थिक स्तर, सब कुछ एक जैसा होता है। उन्हें 10-10 के दो भागों में बांट दिया जाता है। पहले भाग को CLA के कैप्सूल दिए जाते हैं और दूसरे भाग को Dummy कैप्सूल दिए जाते हैं जो पूरी तरह से न्यूट्रल (प्रभावरहित) होते हैं। ऐसे प्रभावरहित कैप्सूल को Placebo कहा जाता है। भोजन, शारीरिक गति-विधि और बाकी सभी दिनचर्या एक जैसी रखी जाती है और लंबे समय तक उनकी जानकारी को एकत्रित किया जाता है। अंत में यह देखा जाता है कि जिस समूह ने CLA का प्रयोग किया था और जिस समूह ने CLA का प्रयोग नहीं किया था, उन दोनों के मध्य क्या अंतर है। ऐसा करने से हमें यह पता चल जाता है कि CLA फैट लॉस पर कैसे काम करता है।

Clinical Trials बहुत ही विश्वसनीय होते हैं। ऊपर दिया गया उदाहरण बहुत ही सरल उदाहरण है। हम आगे Clinical Trials, Cross-Sectional Studies, Case-Control Studies और Cohort Studies पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

धन्यवाद।।

Featured image is by Andrey Chernogorodov, licensed under the Creative Commons Attribution 4.0 International license.

Author: Vikas Dhavaria

A free spirit who loves to read books. Interested in philosophy and nutrition.

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